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Trees

   

 

01-Neem Tree–   Azadirachta indica 

 

नीम के पेड़ (Neem Tree) से शायद ही कोई अपरिचित हो। नीम को उसके कड़वेपन के कारण जाना जाता है। सभी लोगों को पता होगा कि कड़वा होने के बाद भी नीम स्वास्थ्य के लिए बहुत अधिक लाभदायक होता है, लेकिन नीम के फायदे क्या-क्या हैं या नीम का उपय़ोग किन-किन रोगों में कर सकते हैं, इस बात की पूरी जानकारी आपको नहीं होगी। नीम के गुणों के कारण इसे धरती का कल्प वृक्ष भी कहा जाता है। आमतौर पर लोग नीम का प्रयोग घाव, चर्म रोग में फायदा लेने के लिए करते हैं लेकिन सच यह है नीम के फायदे (Neem Ke Fayde) अन्य कई रोगों में भी मिलते हैं।

 

नीम के पत्ते का काढ़ा घावों को धोने में कार्बोलिक साबुन से भी अधिक उपयोगी है। कुष्ठ आदि चर्म रोगों पर भी नीम बहुत लाभदायक है। इसके रेशे-रेशे में खून को साफ करने के गुण भरे पड़े हैं। नीम का तेल (Neem ka Tel) टीबी या क्षय रोग को जन्म देने वाले जीवाणु की तीन जातियों का नाश करने वाले गुणों से युक्त पाया गया है। नीम की पत्तियों का गाढ़ा लेप कैंसर की बढ़ाने वाली कोशिकाओं की बढ़ने की क्षमता को कम करता है। आइए जानते हैं कि आप किन-किन रोगों में नीम का उपयोग कर सकते है और नीम के नुकसान (Neem ke nuksan) क्या होते हैं।

 

 

नीम क्या है?

नीम (Neem Ka Ped) भारतीय मूल का एक पूर्ण पतझड़ वृक्ष है जो 15-20 मीटर (लगभग 50-65 फुट) की ऊंचाई तक पहुंच सकता है। कभी-कभी 35-40 मीटर (115-131 फुट) तक भी ऊंचा हो सकता है। इसकी शाखाएं यानी डालियाँ काफी फैली हुई होती हैं। तना सीधा और छोटा होता है और व्यास में 1.2 मीटर तक पहुँच सकता है।

इसकी छाल कठोर तथा दरारयुक्त होती है और इसका रंग सफेद-धूसर या लाल, भूरा भी हो सकता है। 20-40 सेमी (8 से 16 इंच) तक लंबी पत्तियों की लड़ी होती है जिनमें, 20 से लेकर 31 तक गहरे हरे रंग के पत्ते (neem leaves) होते हैं। इसके फूल सफेद और सुगन्धित होते हैं। इसका फल चिकना तथा अंडाकार होता है और इसे निबौली कहते हैं। फल का छिलका पतला तथा गूदे तथा रेशेदार, सफेद पीले रंग का और स्वाद में कड़वा-मीठा होता है। इसकी गुठली सफेद और कठोर होती है जिसमें एक या कभी-कभी दो से तीन बीज होते हैं।

 

अन्य भाषाओं में नीम के नाम 

नीम का वानस्पतिक यानी लैटिन भाषा में नाम एजाडिरैक्टा इण्डिका (Azadirachta indica ) है। यह कुल मीलिएसी (Meliaceae) का पौधा है।

अंग्रेजी तथा विविध भारतीय भाषाओं में इसके नाम निम्नलिखित हैं।

Neem in –

  • Hindi –नीम, निम्ब
  • English –मार्गोसा ट्री (Margosa tree), नीम (Neem)
  • Sanskrit –निम्ब, पिचुमर्द, पिचुमन्द, तिक्तक, अरिष्ट, हिङ्गुनिर्यास, सर्वतोभद्र, मालक, अर्कपादप, छर्दन, हिजु, काकुल, निम्बक, प्रभद्र, पूकमालक, पीतसारक, गजभद्रक, सुमना, सुभद्र, शुकप्रिय, शीर्षपर्ण, शीत, धमन, अग्निधमन
  • Garhwali –बेटैन (Betain), निम (Nim)
  • Oriya –नीमो (Nimo), निम्ब (Nimb)
  • Urdu –नीम (Neem)
  • Kannada –निम्ब (Nimb), बेवू (Bevu)
  • Gujarati –लिम्बा(Limba), कोहुम्बा (Kohumba)
  • Telugu – वेमू(Vemu), वेपा (Vepa)
  • Tamil – बेम्मू(Bemmu), वेप्पु (Veppu)
  • Bengali – निम(Nim), निमगाछ (Nimgachh)
  • Nepali –नीम (Neem)
  • Punjabi – निम्ब(Nimb), निप (Nip), बकम (Bakam)
  • Marathi – बलन्तनिंब(Balantnimba)
  • Malayalam – वेप्पु(Veppu), निम्बम (Nimbam)
  • Arabic – अजाडेरिखत(Azadirakht), मरगोसा (Margosa), निम (Nim)
  • Persian – नीब(Neeb), निब (Nib), आजाद दख्तुल हिंद (Azad dakhtul hind)

 

नीम के फायदे और उपयोग 

नीम को निम्ब भी कहा जाता है। कई ग्रन्थों में वसन्त-ऋतु (विशेषतः चैत्र मास मतलब 15 मार्च से 15 मई) में नीम के कोमल पत्तों (Neem Ke Patte Ke Fayde In Hindi) के सेवन की विशेष प्रंशसा की गई है। इससे खून साफ होता है तथा पूरे साल बुखार, चेचक आदि भयंकर रोग नहीं होते हैं। विभिन्न रोगों में नीम का प्रयोग (uses of neem in hindi) करने की विधि नीचे दी जा रही हैः-

 

बालों की समस्याओं में लाभकारी है नीम का प्रयोग 

नीम के फायदे बालों के लिए बहुत ही लाभकारी है। बाल झड़ने से लेकर बालों के असमय पकने जैसी बालों की समस्याओं में इसका प्रयोग किया जा सकता है।

  1. नीमके बीजों को भांगरा के रस तथा असन पेड़ की छाल के काढ़े में भिगो कर छाया में सुखाएं। ऐसा कई बार करें। इसके बाद इनका तेल निकालकर नियमानुसार 2-2 बूँद नाक में डालें। इससे असमय सफेद हुए बाल काले हो जाते हैं। इस प्रयोग के दौरान केवल दूध और भात यानी पके हुए चावल ही खाने चाहिए।
  2. नीमके बीज के तेल को नियमपूर्वक 2-2 बूँद नाक में डालने से सफेद बाल काले हो जाते है। इस दौरान केवल गाय का दूध ही भोजन के रूप में लेना होता है। नीम के पत्ते (Neem Ke Patte) एक भाग तथा बेर पत्ता 1 भाग को अच्छी तरह पीस लें। इसका उबटन या लेप सिर पर लगाकर 1-2 घंटे बाद धो डालें। इससे भी बाल काले, लंबे और घने होते हैं।
  3. नीमके पत्तों को पानी में अच्छी तरह उबालकर ठंडा हो जाने दें। इसी पानी से सिर को धोते रहने से बाल मजबूत होते हैं, बालों का गिरना या झड़ना रुक जाता है। इसके अतिरिक्त सिर के कई रोगों में लाभ होता है।
  4. सिरमें बालों के बीच छोटी-छोटी फुन्सियां हों, उनसे पीव निकलता हो या केवल खुजली होती हो तो नीम का प्रयोग बेहतर परिणाम देता है। ऐसे अरूंषिका तथा क्षुद्र रोग में सिर तथा बालों को नीम के काढ़े से धोकर रोज नीम का तेल (Neem ka Tel) लगाते रहने से तुरंत लाभ होता है।
  5. नीमके बीजों को पीसकर लगाने से या नीम के पत्तों  के काढ़े से सिर धोने से बालों की जुँए और लीखें मर जाती हैं।

 

 

02- PEEPAL TREE-  Ficus religiosa

 

शायद ही कोई इंसान होगा जो पीपल के पेड़ (Peepal Tree) के बारे में नहीं जानता होगा। हाथी इसके पत्तों को बड़े चाव से खाते हैं। इसलिए इसे गजभक्ष्य भी कहते हैं। पीपल का पेड़ प्रायः हर जगह उपलब्ध होता है। सड़कों के किनारे, मंदिर या बाग-बगीचों में पीपल का पेड़ हमेशा देखने को मिलता है। शनिवार को हजारों लोग पीपल के पेड़ की पूजा भी करते हैं। अभी भी लोगों को पीपल के पेड़ से जुड़ी जानकारियां (Peepal tree information) काफी कम है, अधिकांश लोग सिर्फ यही जानते हैं कि इसकी केवल पूजा होती है, लेकिन सच यह है कि पीपल के पेड़ का औषधीय प्रयोग भी किया जाता है और इससे कई रोगों में लाभ लिया जा सकता है।

कई पुराने आयुर्वेदिक ग्रंथों में पीपल के पेड़ और इसकी पत्तियों (Peepal Leaf) के गुणों के बारे में बताया गया है कि पीपल के प्रयोग से रंग में निखार आता है, घाव, सूजन, दर्द से आराम मिलता है। पीपल खून को साफ करता है। पीपल की छाल मूत्र-योनि विकार में लाभदायक होती है। पीपल की छाल के उपयोग से पेट साफ होता है। यह सेक्सुअल स्टेमना को भी बढ़ाता है और गर्भधारण करने में मदद करता है। सुजाक, कफ दोष, डायबिटीज, ल्यूकोरिया, सांसों के रोग में भी पीपल का इस्तेमाल लाभदायक होता है। इतना ही नहीं, अन्य कई बीमारियों में भी आप पीपल का उपयोग कर सकते हैं। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

 

 

पीपल क्या है?

पीपल विषैली कार्बन डाइआक्साईड सोखता है और प्राणवायु मतलब ऑक्सीजन छोड़ता (peepal tree information in hindi) है। पीपल के पेड़ की छाया बहुत ठंडी होती है। पीपल का पेड़ लगभग 10-20 मीटर ऊँचा होता है। यह अनेक शाखाओं वाला, विशाल औक कई वर्षों तक जीवित रहता है। पुराने वृक्ष की छाल फटी व सफेद-श्यमाले रंग की होती है। इसके नए पत्ते (Peepal Leaf) कोमल, चिकने तथा हल्के लाल रंग के होते हैं। इसके फल चिकने, गोलाकार, छोटे-छोटे होते हैं। कच्ची अवस्था में हरे और पके अवस्था में बैंगनी रंग के होते हैं।

पीपल के पेड़ (peepal plant) की जड़ भूमि के अन्दर उपजड़ों से युक्त होती है और बहुत दूर तक फैली रहती है। वट वृक्ष के समान ही इसके पुराने वृक्ष के तने तथा मोटी-मोटी शाखाओं से जटाएं निकलती हैं। इसे पीपल की दाढ़ी कहते हैं। ये जटायें बहुत मोटी तथा लम्बी नहीं होती। इसके तने या शाखाओं को तोड़ने या छिलने से या कोमल पत्तों को तोड़ने से एक प्रकार का चिपचिपा सफेद पदार्थ (दूध जैसा) निकलता है।

स्वामी रामदेव जी द्वारा किया गया अनुभव

पीपल का ताजा पत्ता लेकर कूट-पीसकर उसका रस निकाल लें। 5-5 बूंद नाक में डालने से नाक से खून आना बंद हो जाता है। 10-15 मिली रस में थोड़ी मिश्री मिलाकर पीने से भी लाभ मिलता है।

 

अनेक भाषाओं में पीपल के नाम 

पीपल का वानस्पतिक नाम Ficus religiosa  (फाइकस् रिलीजिओसा)  है और यह Moraceae (मोरेसी) कुल का है। पीपल को देश या विदेश में अन्य इन नामों से भी जाना जाता हैः-

Peepal in –

  • Hindi (Peepal tree in hindi) – पीपलवृक्ष (Pipal vriksh)
  • English (Peepal tree in english) – पीपलट्री (Peepal tree), द बो ट्री (The bo tree), बोद्ध ट्री (Bodh tree), द ट्री ऑफ इन्टेलिजेन्स (The tree of intelligence), Sacred fig (सेक्रेड फ्रिग)
  • Sanskrit – पिप्पल, कुञ्जराशन, अश्वत्थ, बोधिवृक्ष, चलदल, बोधिद्रुम, गजाशन
  • Oriya – जोरी(Jori), पिप्पलो (Pipplo), उस्टो पिपौलो (Osto pippolo)
  • Urdu – पिपल(Pipal)
  • Assamese – अंहोत(Anhot)
  • Konkani – पिम्पोल(Pimpoll)
  • Kannada – अरली(Arali)
  • Gujarati – पीपरो(Pipro)
  • Tamil – अरशुमरम्(Arsumaram), अरसू (Arasu)
  • Telugu – राविचेट्टु(Ravichettu), अश्वत्थामु (Ashvatthamu)
  • Nepali – पीपल(Pipal)
  • Punjabi – पीपल(Pipal)
  • Bengali – अश्वत्थ(Asvatwha)
  • Marathi – पिंपल(Pimpal)
  • Malayalam (Peepal tree in malayalam) : अराचु(Arachu), अरसु (Arsu), अरयाल (Arayal)
  • Manipuri – सनाखोन्गनांग (Sana khongnang)
  • Persian – दरख्तेलरञ्जा (Darakhte laranza)

 

पीपल के फायदे और उपयोग 

पीपल के वृक्ष (Peepal ka Pedh) के लाभ या औषधीय प्रयोग, प्रयोग की मात्रा एवं विधियां ये हैंः-

 

आंखों की बीमारी में पीपल का प्रयोग लाभदायक 

पीपल के पत्ते (Peepal Leaf) के फायदे से आंखों के रोग ठीक किए जा सकते हैं। पीपल के पत्तों (peepal leaf) से से जो दूध (आक्षीर) निकलता है, उसको आंख में लगाने से आंखों में होने वाला दर्द ठीक हो जाता है।

 

दांतों के रोग में पीपल से लाभ 

पीपल और वट वृक्ष की छाल को समान मात्रा में मिलाकर जल में पका लें। इसका कुल्ला करने से दांतों के रोग ठीक होते हैं।

पीपल की ताजी टहनी से रोज दातुन (ब्रश) करने से दांत मजबूत होते हैं। इससे बैक्टीरिया खत्म होते हैं और मसूड़ों की सूजन भी कम होती है। इसके अलावा पीपल की दातुन करने से मुंह से आने वाली दुर्गंध भी खत्म हो जाती है।

 

हकलाहट की समस्या में पीपल का उपयोग फायदेमंद 

पीपल के वृक्ष के लाभ हकलाने की समस्या में भी फायदे पहुंचाते हैं। पीपल के आधी चम्मच पके फल के चूर्ण में शहद मिला लें। इसका सुबह-शाम सेवन करने से हकलाहट की बीमारी में लाभ होता है।

 

कुक्कुरखांसी में पीपल से फायदा 

40 मिली पीपल के पेड़ (peepal plant) की छाल का काढ़ा या 10 मिली रस को दिन में तीन बार देने से कुक्कुर खांसी में लाभ होता है।

 

दमा रोग में पीपल से लाभ 

आयुर्वेदिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आप सांस की बीमारी से पीड़ित हैं तो पीपल के पेड़ के आस पास रहना आपके लिए फायदेमंद है। पीपल का पेड़ वायु को शुद्ध रखता है और अन्य पेड़ों की तुलना में अधिक ऑक्सीजन वायुमंडल में छोड़ता है। इसके अलावा आप सांस से जुड़ी बीमारियों जैसे कि अस्थमा के घरेलू इलाज के रूप में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. आइये जानते हैं उपयोग का तरीका

  • पीपलकी छाल और पके फल के चूर्ण को बराबर मिलाकर पीस लें। आधा चम्मच मात्रा में दिन में तीन बार सेवन करने से दमे में लाभ होता है।
  • पीपलके सूखे फलों को पीसकर 2-3 ग्राम की मात्रा में 14 दिन तक जल के साथ सुबह-शाम सेवन करें। इससे सांसों की बीमारी और खांसी में लाभ होता है।

 

अत्यधिक प्यास लगने की समस्या में पीपल से फायदा 

पीपल की 50-100 ग्राम छाल के कोयलों को पानी में बुझा लें। इस पानी को साफ कर पिलाने से हिचकी की समस्या, उल्टी और अत्यधिक प्यास लगने की समस्या में लाभ होता है।

 

भूख बढ़ाने के लिए पीपल का प्रयोग लाभदायक 

अगर आपको भूख कम लगती है तो पीपल के वृक्ष के लाभ इस समस्या में ले सकते हैं। पीपल के पके फलों के सेवन से कफ, पित्त, रक्तदोष, विष दोष, जलन, उल्टी तथा भूख की कमी की समस्या ठीक होती है।

 

पेट के दर्द में पीपल का उपयोग फायदेमंद 

पीपल के पत्ते (peepal leaf) के फायदे से पेट के दर्द ठीक होते हैं। पीपल के ढाई पत्तों को पीसकर 50 ग्राम गुड़ में मिलाकर गोली बना लें। इसे दिन में 3-4 बार खाना चाहिए।

 

शारीरिक कमजोरी को दूर करने के लिए पीपल के पेड़ का इस्तेमाल 

आधा चम्मच पीपल के फल का चूर्ण को दिन में तीन बार दूध के साथ सेवन करते रहने से शारीरिक कमजोरी दूर होती है।

 

कब्ज की परेशानी में पीपल से लाभ 

पीपल के पत्ते के फायदे से कब्ज की समस्या ठीक होती है। कब्ज हो तो पीपल के 5-10 फल को नियमित रूप से खाएं। कब्ज ठीक हो जाता है।

पीपल का पत्ता (Peepal Leaf) और कोमल कोपलों का काढ़ा बना लें। 40 मिली काढ़ा को पिलाने से पेट साफ हो जाता है और कब्ज की समस्या ठीक हो जाती है।

 

पेचिश में फायदेमंद पीपल का पेड़ 

पीपल (Peepal ka Pedh) की कोमल टहनियां, धनिया के बीज तथा मिश्री को बराबर भाग में मिला लें। 3-4 ग्राम रोज सुबह और शाम सेवन करने से पेचिश में लाभ होता है।

 

पीलिया रोग में पीपल का इस्तेमाल 

पीपल के 3-4 नए पत्तों (peepal leaf) को मिश्री के साथ 250 मिली पानी में बारीक पीस-घोलकर छान लें। यह शर्बत रोगी को 2 बार पिलाएं। इसे 3-5 दिन प्रयोग करें। यह पीलिया रोग के लिए रामबाण औषधि है।

 

तिल्ली विकार (प्लीहाशोथ) में पीपल का प्रयोग 

अगर कोई रोग तिल्ली विकार जैसे तिल्ली में सूजन की समस्या से ग्रस्त है तो उसे पीपल के वृक्ष के लाभ लेने चाहिए। पीपल की 10-20 ग्राम छाल को जलाकर उसकी राख में समान भाग कलमी शोरा मिला लें। इस चूर्ण को एक पके हुए केले पर छिड़ककर एक केला रोज खाने से प्लीहा (तिल्ली) सूजन ठीक होती है।

 

मधुमेह में फायदेमंद पीपल का पेड़ 

पीपल के पेड़ (peepal plant) की छाल का 40 मिली काढ़ा पिलाने से पित्तज दोष और डायबिटीज में लाभ होता है।

 

मूत्र रोग (पेशाब से संबंधित बीमारी) में पीपल का उपयोग 

पीपल की छाल का काढ़ा पिलाने से पेशाब के रुक-रुक कर आने की समस्या में लाभ होता है।

 

सिफलिस (उपदंश) रोग में पीपल का इस्तेमाल लाभदायक 

पीपल की छाल को जलाकर भस्म बना लें। इस भस्म को उपदंश (सिफलिस) पर छिड़कने से लाभ होता है।

 

गले के रोग में पीपल के पेड़ का प्रयोग फायदेमंद 

गले के रोग में पीपल की अंतर छाल को गुलाब जल में घिसकर लगाएं। इससे घाव जल्दी भर जाते हैं।

 

बांझपन की समस्या में फायदेमंद पीपल का इस्तेमाल 

पीपल के वृक्ष के लाभ से बांझपन की समस्या में फायदा मिलता है। मासिक धर्म खत्म होने के बाद 1-2 ग्राम पीपल के सूखे फल के चूर्ण को कच्चे दूध के साथ पिएं। 14 दिन तक देने से महिला का बांझपन मिटता है।

 

एड़ियों के फटने (बिवाई) में पीपल से लाभ 

कई लोगों को यह शिकायत रहती है कि उनके पैरों की एड़ियां फट गई है। ऐसे में पीपल के पत्ते के फायदे ले सकते हैं। हाथ-पांव फटने पर पीपल के पत्तों का रस या दूध (आक्षीर) लगाएं। यह लाभ पहुंचाता है।

 

 

03- BANYAN TREE- Ficus benghalensis

 

बरगद के पेड़ को वट वृक्ष या बड़ के पेड़ भी कहा जाता है। आपने अपने घरों के आसपास या मंदिरों में बरगद का पेड़ देखा होगा। महिलाएं बट सावित्री की पूजा के दौरान बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। बरगद का पेड़ बहुत विशाल और बड़े-बड़े पत्तों वाला होता है। क्या आप जानते हैं कि रोगों के इलाज में भी बरगद के पेड़ के फायदे मिलते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, बरगद का पेड़ (Banyan tree) एक उत्तम औषधि भी है और आप बरगद के पेड़ से कई बीमारियों का इलाज कर सकते हैं।

केवल बरगद का पेड़ ही नहीं बल्कि बरगद की छाल, बरगद के फल (bargad ka fal), बरगद के बीज, बरगद का दूध (bargad ka doodh) भी रोगों के इलाज के लिए उपयोग किया जाता है। बरगद के पेड़ (Bargad ka ped) से कफवातपित्‍त दोष को ठीक किया जा सकता है। नाक, कान या बालों की समस्या में भी बरगद के पेड़ के फायदे मिलते हैं। आइए जानते हैं कि बरगद के पेड़ के और क्या-क्या लाभ हैं।

 

बरगद क्या है?

बरगद का वृक्ष विशाल तना और शाखाओं वाला होता है। यह बहुत ही छायादार और लंबे समय तक जीवित रहने वाला पेड़ है। इसकी सबसे बड़ी खूबी है कि यह अकाल के समय भी जीवित रहता है। मनुष्‍य बरगद के पेड़ के फल खाते हैं तो जानवर इसके पत्‍ते खाते हैं। यहां बरगद के पेड़ से होने वाले सभी फायदे के बारे को बहुत ही आसान शब्दों (Bargat Tree in hindi) में लिखा गया है ताकि आप बरगद के पेड़ से पूरा-पूरा लाभ ले पाएं।

 

 

अनेक भाषाओं में बरगद के नाम 

बरगद को मूलतः बड़ या बट के नाम से ही जानते हैं,  लेकिन इसके अलावा भी देश-विदेश में बरगद को कई नाम से जाना जाता है। बरगद (bargad ka ped) का वानस्पतिक नाम Botanical name Ficus benghalensisLinn. (फाइकस् बेंगालेन्सिस्) Syn-Ficus banyana Oken है और इसके अन्य नाम ये हैंः-

Banyan tree in:-

  • Hindi (bargad tree in hindi) – बर, बरगट, बरगद, बट
  • English – ईस्टइण्डियन फिग ट्री (East Indian fig tree)
  • Sanskrit – वटवृक्ष, न्यग्रोध, वैश्रवणालय, बहुपाद, रक्तफल (bargad ka fal),  शृङ्गी, स्कन्धज, ध्रुव, क्षीरी, वैश्रवण, वास, वनस्पति
  • Oriya – बरो(Boro)
  • Urdu – बर्गोडा(Bargoda)
  • Konkani – वड(Vad)
  • Kannada– अल(Al), अला (Ala), मरा (Mara)
  • Gujarati – वड(Vad), वडलो (Vadlo)
  • Tamil – अला(Ala), अलम (Alam)
  • Telugu – मर्री(Marri), वट वृक्षी (Vati)
  • Bengali – बर(Bar), बोट (Bot), बडगाछ (Badgach)
  • Nepali – बर(Bar)
  • Punjabi – बरगद(Bargad), बर (Bar)
  • Malayalam – अला(Ala), पेरल (Peral)
  • Marathi – वड(Wad), वर (War)
  • Arabic – जतुलेजईब्वा(Jhatulejaibva), तईन बनफलिस (Taein banfalis)
  • Persian – दरखत्तेरेशा(Darakhteresha)

 

बरगद के पेड़ के फायदे और उपयोग 

बरगद का पेड़ अपने विभिन्‍न औषधीय प्रयोगों और और गुणों से महिलापुरुषबच्‍चे और बुजुर्ग सभी के लिए अत्‍यंत फायदेमंद है। बरगद के पेड़ का उपयोग (bargad ka ped) या औषधीय इस्‍तेमाल इस प्रकार से किया जाना चाहिए:

 

बालों की समस्या में बरगद के पेड़ के फायदे वट वृक्ष (bargad ka tree) के पत्ते लें। इसका भस्म बना लें। 20-25 ग्राम भस्म को 100 मिलीग्राम अलसी के तेल में मिलाकर सिर में लगाएं। इससे बालों की समस्‍या दूर होती है।

  • वटवृक्ष के स्वच्छ कोमल पत्‍तों के रस में, बराबर मात्रा में सरसों का तेल मिला लें। इसे आग पर पका लें। इस तेल को बालों में लगाने से बालों की सभी प्रकार की समस्‍याएं दूर होती हैं।
  • बड़(banyan tree uses) की जटा और जटामांसी का चूर्ण 25-25 ग्राम, तिल का तेल 400 मिलीग्राम तथा गिलोय का रस 2 लीटर लें। इन सभी को आपस में मिलाकर धूप में रखें। पानी सूख जाने पर तेल को छान लें। इस तेल से सिर पर मालिश करें। इससे गंजेपन की समस्या खत्म होती है, और सिर पर बाल आते हैं। इससे बाल झड़ना बंद हो जाता है। बाल सुंदर और सुनहरे हो जाते हैं।
  • बड़की जटा और काले तिल को बराबर भाग में मिलाकर खूब महीन पीस लें। इसे सिर पर लगाएं। आधा घंटे बाद कंघी से बालों को साफ कर लें। अब सिर में भांगरा और नारियल की गिरी दोनों को पीसकर लगाएं। कुछ दिन ऐसा करते रहने से कुछ दिनों में बाल लम्बे हो जाते हैं।

 

 

बरगद के फायदे आंखों के रोगों में बड़ के 10 मिलीलीटर दूध में 125 मिलीलीटर कपूर और 2 चम्मच शहद मिलाएं। इसे आखों में लगाने (काजल की तरह) से आखों की समस्‍याएं दूर होती हैं।

  • बड़के दूध को 2-2 बूंद आंखों में डालने से आंखों से संबंधित रोगों का उपचार होता है। इसका प्रयोग चिकित्सक की सलाह से करें।

 

नाक से खून आने पर बरगद के औषधीय गुण से लाभ 3 ग्राम बरगद की जड़ की छाल लें। इसे लस्सी के साथ पिएं। इससे नाक से खून आने की समस्या में लाभ होता है।

  • 10 से20 ग्राम तक वट वृक्ष के कोपलों या पत्तों को पीस लें। इसमें शहद और चीनी मिलाकर सेवन करने से खूनी पित्त में लाभ होता है।

 

कान के रोगों में बरगद के पेड़ से फायदे कान में यदि फुंसी हो तो वट वृक्ष के दूध की कुछ बूंदों में सरसों के तेल मिलाकर काने में डालें। इससे कान की फुंसी ठीक हो जाती है।

  • वटवृक्ष के 3 बूंद दूध (bargad tree milk benefits) को बकरी के 3 ग्राम कच्‍चे दूध में मिलाकर कान में डालें। इससे कान की फुंसी  खत्म हो  जाती है।

 

बरगद के औषधीय गुण से चेहरे की चमक में बढ़ोतरी वट वृक्ष (bargad ka ped) के 5-6 कोमल पत्ते या जटा को 10-20 ग्राम मसूर के साथ पीसकर लेप तैयार कर लें। इससे चेहरे पर लगाएं। इससे उभरने वाले मुंहासे और झाई दूर होती है।

  • वटवृक्ष के पीले पके पत्तों के साथ, चमेली के पत्ते, लाल चन्दन, कूट, काला अगर और पठानी लोध्र 1-1 भाग में लें। इनको पानी के साथ पीस लें। इसका लेप करने से मुहांसे तथा झाई की समस्या दूर हो जाती है।
  • निर्गुण्डीबीज, बड़ के पीले पके पत्ते, प्रियंगु, मुलेठी, कमल का फूल, लोध्र, केशर, लाख तथा इंद्रायण चूर्ण को बराबर भाग में लें। इन्हें पानी के साथ पीसकर लेप तैयार करें। इसे चेहरे पर लगाने से चेहरे की चमक बढ़ जाती है।

 

दांतों के रोग में बरगद के पेड़ के फायदे  10 ग्राम बड़ की छाल के साथ 5 ग्राम कत्था और 2 ग्राम काली मिर्च लें। इन तीनों को खूब महीन पीसकर चूर्ण बना लें। इसका मंजन करने से दांतों का हिलना, दांतों की गंदगी, मुंह से दुर्गंध आने जैसी परेशानी दूर होते हैं। दांत स्वच्छ एवं सफेद होते हैं।

  • दांतोंमें दर्द हो रहा है तो दर्द वाले स्थान पर बरगद का दूध लगाएं। इसमें आराम मिलता है।
  • यदिकिसी दांत आ रहा हो तो उस स्‍थान पर बरगद का दूध (bargad ka doodh) लगा दें। इससे दांत आसानी से निकल आते हैं।

 

04- KADAM TREE- Anthocephalus cadamba

 

कदम्ब या कदम का पेड़ को देव का वृक्ष माना जाता है। कदम्ब आयुर्वेद में अपने औषधीय गुणों के लिए बहुत ही मशहूर है। कदम्ब का स्वास्थ्यवर्द्धक गुण (Kadamba tree uses) बहुत सारे रोगों के उपचार के लिए उपयोग किया जाता है।

कदम्ब की एक विशेष बात ये है कि इसके पत्ते बहुत बड़े होते है और इसमें से गोंद निकलता है। इसके फल नींबू की तरह होते हैं। कदम के फूलों (Kadamba Pushpam) का अपना अलग ही महत्व है। प्राचीन वेदों और रचनाओं में इन सुगन्धित फूलों (kadamba flower) का उल्लेख मिलता है।

कदम्ब की एक विशेष बात ये है कि इसके पत्ते बहुत बड़े होते है और इसमें से गोंद निकलता है। इसके फल नींबू की तरह होते हैं। चलिये इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

 

 

कदम्ब क्या है?

भारत में सुगन्धित पुष्पों में कदम्ब (Kadamba Pushpam) का बहुत महत्व है। इसके फूल भगवान् कृष्ण को अत्यन्त प्रिय थे। आयुर्वेद में कदम्ब की कई जातियों यानि राजकदम्ब, धारा कदम्ब, धूलिकदम्ब तथा भूमिकदम्ब आदि उल्लेख प्राप्त होता है। चरक, सुश्रुत आदि प्राचीन ग्रन्थों में कई स्थानों पर कदम्ब का वर्णन मिलता है।

इसके अतिरिक्त इसकी एक और प्रजाति पाई जाती है जिसे भूमि कदम्ब  (Mitragyna parvifolia (Roxb.) Korth.) कहते हैं।

  1. Anthocephaluscadamba  (कदम्ब)-
  2. Mitragynaparvifolia  (भूमि कदम्ब)- भूमिकदम्ब का 10-20 मी ऊँचा पेड़ भारत के शुष्क वनों में पाया जाता है। इसके फूल (Kadamba Pushpam) मुण्डक कदम्ब के पुष्पमुण्डकों के समान परन्तु आकार में छोटे सफेद रंगों के होते हैं। जो सूखने पर भूरे-काले रंग के हो जाते हैं तथा पूरे साल वृक्ष पर लगे रहते हैं।

कदम्ब कड़वा होता है। यह तीन दोषों को हरने वाला, दर्दनिवारक, स्पर्म काउन्ट बढ़ाने के साथ ब्रेस्ट का साइज बढ़ाने में भी मदद करता है।

कदम्ब का फल खांसी, जलन, योनिरोग, मूत्रकृच्छ्र (मूत्र संबंधी रोग), रक्तपित्त (नाक-कान से खून निकलना), अतिसार (दस्त), प्रमेह (डायबिटीज), मेदोरोग (मोटापा) तथा कृमिरोग नाशक होते हैं। कदम्ब के पत्ते कड़वे, छोटे, भूख बढ़ाने में सहायक तथा अतिसार या दस्त में फायदेमंद होते  हैं।

इसके कच्चे फल एसिडिक, गर्म, भारी, कफ को बढ़ाने वाला तथा रुचिकारक होते हैं। इसका पका फल थोड़ा एसिडिक होता है और वात को कम करने वाला तथा कफपित्त को उत्पन्न करने वाला होता है। इसका अंकुर कड़वा, ठंडे तासीर का होने के साथ खाने की इच्छा बढ़ाता है, रक्तपित्त (नाक-कान से खून बहना) तथा दस्त में फायदेमंद होता है।

अन्य भाषाओं में कदम्ब के नाम 

कदम्ब का वानस्पतिक नाम :   Anthocephalus cadamba (एंथोसिफेलस कदंब)

Syn-Nauclea cadamba , Neolamarckia cadamba है। यह  Rubiaceae (रूबिएसी) कुल का है। इसको अंग्रेजी में Wild Cinchona (वाइल्ड सिन्कोना) कहते हैं।

भारत के अन्य प्रांतों में कदम्ब को भिन्न भिन्न नामों से पुकारा जाता है।

Kadamb in-

  • Sanskrit-नीप, प्रियक, कदम्ब, वृत्तपुष्प, हलिप्रिय;
  • Hindi-कदम, कदम्ब;
  • Odia-कदम्बो(Kadambo), नीपो (Nipo);
  • Kannada–कडुवे(Kaduwe), कदावली (Kadawali);
  • Gujrati –कदम्ब(Kadamb), कदम्बा (Kadamba);
  • Teluguकदंबमु(Kadambamu), तुद्रा (Tudra);
  • Tamil-वेल्लाकदम्ब(Vellakadamb);
  • Bengali-कदम(Kadam), कलम्ब (Kalamb), बोलकदम (Bolkadam);
  • Nepali-कदम(Kadam);
  • Marathi-कदम्ब(Kadamb), कलम्ब (Kalamb);
  • Malayalam–अट्टुट्टेक्का(Attuttekka), कटम्पु (Katampu)।
  • English-कदम(Kadam), चायनीज एंथोसिफेलस (Chinese anthocephalus), कॉमन बर-फ्लावर ट्री (Common bur-flower tree)

 

कदम्ब के फायदे 

कदम्ब के अनगिनत गुणों के आधार पर इसके फायदे भी अनगिनत हैं। चलिये अब जानते हैं कि कदम्ब (kadamba flower) अपने गुणों के आधार पर किन-किन बीमारियों में कैसे काम आता है-

 

 

आंखों के बीमारी के लिए कदम्ब के फायदे 

अक्सर दिन भर काम करने के बाद आँखों में दर्द होने की शिकायत होती है। कदम्ब के तने के छाल को पीस-छानकर, उससे प्राप्त रस को आँखों के बाहर चारों तरफ लगाने से आँखों का दर्द कम होता है।

पूयदंत में फायदेमंद कदम्ब 

कदम्ब के पत्तों का काढ़ा बनाकर गरारा करने से मुँह की बदबू तथा पूयदंत (पाइरिया) आदि बीमारियों में फायदा पहुँचता है।

मुँह के छालों से दिलाये राहत कदम्ब 

अक्सर शरीर में पोषण की कमी या असंतुलित खान-पान के कारण मुँह में छाले पड़ जाते हैं। कदम्ब के पत्तों का काढ़ा बनाकर गरारा करने से मुंह के छालों से राहत मिलती है।

मूत्र संबंधी बीमारी में फायदेमंद कदम्ब 

मूत्र संबंधी बीमारी में मूत्र करते वक्त दर्द होना, जलन होना या रुक-रुक कर पेशाब आने जैसी समस्या होती है तो कदम्ब का सेवन बहुत काम आता है।

विदारीकंद, कदंब छाल तथा ताड़ फल के पेस्ट एवं काढ़े में पकाए हुए दूध एवं घी को 5-10 मिली की मात्रा में  सेवन करने से  मूत्रकृच्छ्र (दर्द सहित मूत्र त्याग) में लाभ होता है।

खाँसी से दिलाये राहत कदम्ब 

 

अगर खाँसी से राहत नहीं मिल रहा है तो कदम्ब का इस तरह से सेवन बहुत लाभप्रद होता है। 5-10 मिली कदम्ब के तने के छाल का काढ़ा पीने से कास या खाँसी में लाभ होता है।

माताओं के दूध की कमी को ठीक करने मे सहायक कदम्ब 

जिन माताओं को दूध की कमी के कारण अपने शिशु को स्तनपान या ब्रेस्टफिडिंग नहीं करवा पाती, उनके लिए कदंब का सेवन फायदेमंद होता है। एक रिसर्च के अनुसार कदंब के फल का सेवन माताओं में दूध के मात्रा को बढ़ाने में सहायक होता है।

शरीर की दुर्बलता दूर करने में फायदेमंद कदम्ब 

शरीर की दुर्बलता को दूर करने में कदंब सहायक हो सकता है, क्योंकि आयुर्वेद के अनुसार वात का प्रकोप भी दुर्बलता का कारण होता है। कदंब में वात को कम करने का गुण होता है।

पैरों की सूजन और चोट में लाभकारी कदम्ब 

पैरो की चोट और सूजन में कदंब का प्रयोग लाभकारी होता है। चोट लगने या सूजन होने पर कदंब का प्रयोग घाव को शीघ्र भरने और सूजन कम करने में मदद करता है क्योंकि इसमें रोपण और शोथहर का गुण पाया जाता है। 

घाव ठीक करने के लिए सहायक कदम्ब 

घाव जल्दी ठीक करने में कदंब सहयोगी होता है क्योंकि कदंब में रोपण यानि हीलिंग का गुण पाया जाया है जो कि घाव जल्दी ठीक करने में सहायक होता है।

पाचन तंत्र को रखे दुरुस्त कदम्ब 

पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने में कदंब एक प्रभावी औषधि है क्योंकि आयुर्वेद के अनुसार कदंब में कषाय और ग्राही गुण होते है जो कि पाचन शक्ति कमजोर होने के कारण हुए अतिसार को नियंत्रित करता है।

त्वचा सम्बन्धी समस्याओं को दूर करे कदम्ब 

कदंब का प्रयोग त्वचा संबंधी समस्याओं को दूर करने में भी किया जाता है क्योंकि आयुर्वेद के अनुसार इसमें शीत और रोपण गुण होने से ये त्वचा सम्बन्धी समस्याओ में शीघ्र आराम देता है।

कदम्ब का उपयोगी भाग 

आयुर्वेद में कदम्ब के पत्ते ,फूल , जड़ और तने के छाल के काढ़े का ज्यादा प्रयोग किया जाता है।

 

 

 

05-  SHISHAM-   Dalbergia sissoo

 

आपने शीशम के पेड़ को सड़क या बाग-बगीचे में देखा होगा। शीशम की लकड़ी बहुत मजबूत मानी जाती है। आपके घर में भी शीशम की लड़की के कई फर्नीचर बने हुए होंगे। अधिकांशतः शीशम का उपयोग उसकी मजबूत लकड़ी के लिए ही किया जाता है। लोगों को जानकारी ही नहीं है कि शीशम के लकड़ी के अलावा भी अनेक फायदे हैं। आयुर्वेद के अनुसार, शीशम को औषधि के रूप में इस्तेमाल में लाया जाता है, और शीशम से लाभ लेकर कई रोगों का इलाज किया जाता है।

आपको यह जानकर आश्चर्य हो रहा होगा, लेकिन यह सच है। शीशम (shisham tree) के औषधीय गुण से बीमारियों का इलाज संभव है। यहां शीशम के उपयोग से होने वाले फायदे के बारे में बहुत सारी जानकारियां दी गई हैं। आइए जानते हैं कि आप शीशम से किस-किस बीमारी में लाभ ले सकते हैं।

 

 

शीशम क्या है?

शीशम (shisham tree) की लकड़ी का प्रयोग भवनों और फर्नीचर के निर्माण में किया जाता है। इसके साथ ही शीशम के वृक्ष की लकड़ी और बीजों से तेल निकाला जाता है, जिसका औषधि के रूप में प्रयोग होता है। शीशम की निम्नलिखित प्रजातियों का प्रयोग चिकित्सा में किया जाता हैः-

शीशम –Dalbergia sissoo

यह वृक्ष लगभग 30 मीटर तक ऊंचा होता है। इसकी छाल मोटी, भूरे रंग की और दरार वाली होती है। इसके फूल पाण्डुर पीले रंग के और छोटे होते हैं।

कृष्णशिंशप (Dalbergia latifolia)

यह 15-20 मीटर ऊंचा पर्णपाती वृक्ष होता है। जिसकी शाखाएं चिकनी होती हैं। इसके फूल 5-10 मीटर लम्बे गुच्छों में और मटमैले सफेद रंग के होते हैं। इसकी छाल तथा पत्तियों का उपयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है।

 

 

 

अन्य भाषाओं में शीशम के नाम 

भारत में शीशम को मुख्यतः शीशम के नाम से ही जानते हैं, लेकिन इसके और भी नाम हैं। शीशम का वानस्पतिक नाम डैल्बर्जिया सिसो (Dalbergia sissoo) है, और यह फैबेसी (Fabaceae) कुल का है। शीशम के अन्य नाम ये है-

Shisham in-

  • Hindi (shisham tree in hindi) – शीशम, सीसम, शीसोशीसव
  • English – साऊथइण्डियन रोजवुड (South Indian rosewood), ब्लैक वुड (Black wood), रोजवुड (Rosewood), शीशम (Shisham)
  • Sanskrit – श्शांप, पिप्पला, युगपत्तेिका, पिच्छिला, श्यामा, कृष्णसारा
  • Urdu – शीशम(Shisham)
  • Oriya – पदीमी(Padimi), सीसू (Sisu)
  • Assamese – सिसु(Sissu); कोंकणी-सिसो (Sisso)
  • Kannada – बिरिडी(Biridi), अगरू (Agaru)
  • Gujarati – सीसोम(Sissom), सीस (Sis)
  • Telugu – सिंसुपा(Sinsupa)
  • Tamil – गेट्टे(Gette), मुक्कोगेट्टे (Mukkogette)
  • Bengali – शिसु(Shisu)
  • Nepali – बांदरेशिरिण (Bandre shirin), सिस्सो (Sissau)
  • Punjabi – नेलकर(Nelkar), टाली (Tali)
  • Malayalam – इरुविल(Iruvil)
  • Marathi (shisham tree in marathi) – सीसू(sisu), शिसव (Sisva)
  • Arabic – सासम(Sasam), सासीम (Sasim)

 

शीशम के फायदे और उपयोग 

अब तक आपने जाना कि शीशम के पेड़ (shisham tree) के कितने नाम है। आइए अब जानते हैं कि शीशम के इस्तेमाल से कितनी सारी बीमारियों में लाभ लिया जा सकता है। शीशम के औषधीय प्रयोग, औषधीय प्रयोग की मात्रा एवं विधियां ये हैंः-

 

शरीर की जलन में शीशम के तेल के फायदे 

कई पुरुष या महिलाओं को शरीर में जलन की शिकायत रहती है। ऐसे में शीशम के तेल से लाभ मिलता है। शरीर के जिस अंग में जलन हो, वहां शीशम का तेल लगाएं। शरीर की जलन ठीक हो जाती है।

पेट की जलन में शीशम के औषधीय गुण से लाभ 

आप शीशम के फायदे से पेट की जलन का इलाज कर सकते हैं। 10-15 मिली शीशम के पत्ते का रस लें। इसे पिएं। इससे पेट की जलन ठीक होती है।

 

आंखों की बीमारी में शीशम का औषधीय गुण फायदेमंद 

आंखों की बीमारी जैसे आंखों में जलन में शीशम का इस्तेमाल लाभ पहुंचाता है। शीशम के पत्ते (sisam ke patte) के रस में मधु मिला लें। इसे 1-2 बूंदें आंखों में डालने से जलन से आराम मिलता है।

 

बुखार में शीशम के सेवन से लाभ 

हर तरह के बुखार में शीशम से औषधीय गुण से लाभ मिलता है। शीशम का सार 20 ग्राम, पानी 320 मिली और दूध 160 मिली लें। इनको मिलाकर दूध में पकाएं। जब दूध थोड़ा रह जाए तो दिन में 3 बार पिलाएं। इसे बुखार ठीक होता है।

 

एनीमिया में शीशम के सेवन से फायदा 

एनीमिया में व्यक्ति के शरीर में खून की कमी हो जाती है। आप शीशम के औषधीय गुण से एनीमिया में लाभ ले सकते हैं। एनीमिया को ठीक करने के लिए 10-15 मिली शीशम के पत्ते का रस लें। इसे सुबह और शाम लेने से एनीमिया में भी लाभ होता है।